आरक्षण सत्ता में भागीदारी का उपाय है या पैसे में भागीदारी का?

कुछ लोग बहुत पहले से यह बात कहते रहे हैं कि आरक्षण बेरोजगारी खत्म करने का उपाय नहीं है। यह तो सत्ता में भागीदारी का उपाय है। इसलिए इसको आर्थिक नजरिए से ना देखा जाए। इसको सामाजिक नजरिए से देखा जाए। इसी आधार पर यह साबित करते हैं कि संविधान में सामाजिक पिछड़ेपन को पिछड़ापन माना गया लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन को पिछड़ापन नहीं माना गया। मतलब कि मुलायम सिंह और रामविलास पासवान का परिवार पिछड़ा है और इन लोगों की अपनी ही जाति का रिक्शा चलाने वाला गरीब पिछड़ा नहीं है।

अगर आरक्षण बेरोजगारी खत्म करने का उपाय नहीं है और आमदनी का जरिया नहीं है, तो एक काम करिए कि आरक्षण लेने वालों को तैयार करिए कि वह सरकारी विभाग में पद तो लें, लेकिन पैसा ना लें। इससे सत्ता (कथित) में तो भागीदारी मिल ही जाएगी और जो पैसा वह छोड़ेंगे उस पैसे से अपने ही समाज के जरूरतमंद लोगों को रोजगार मिल जाएगा। साथ में एक और शर्त लगाइए। जो लोग आरक्षण से सरकारी नौकरी करें, उनको केवल एक चौथाई वेतन मिले। बाकी तीन चौथाई वेतन अपने समाज के के बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए अनिवार्य रूप से टैक्स लगाने का कानून बन जाए। वह लोग पढ़ेंगे लिखेंगे तो सत्ता में भागीदारी कर पाएंगे। आरक्षण से नौकरी पाने वाले लोग अगर ऐसा नहीं करते तो यह समझना चाहिए कि सत्ता में भागीदारी एक धोखा है, वास्तव में पैसे में भागीदारी का ही उपाय है आरक्षण। और पैसे के अलावा कोई सत्ता नाम की चीज होती नहीं है। सत्ता और पैसा पर्यायवाची हैं। जिसके पास ज्यादा पैसा है, वही सत्तासीन है और वही सत्ता को कठपुतली की तरह नचाता है और सत्ता उसी की सेवक है। असली सत्ता है- पैसा। राजनीतिक सत्ता तो उसकी केवल परछाई है। मालिक है पैसा। राज्यसत्ता तो उसका नौकर भर है। सरकार से खजाना वापस ले लीजिए फिर देखिए सत्ता की ताकत से कैसे चलती है सेना और सत्ता की ताकत से कैसे चलती है पुलिस? वास्तव में अंग्रेजों के जाते समय अंग्रेजों की चापलूसी करके जिन लोगों ने देश का धन हड़पा था, उन्हीं लोगों ने दुश्प्रचार करके सत्ता का गलत अर्थ लोगों को बताया और असली सत्ता यानी पैसे की तरफ ध्यान न जाने पाए, इसके लिए अपने प्रचार की ताकत का पूरा इस्तेमाल करते रहते हैं और 70 साल से हम उनके दुष्प्रचार के शिकार हैं। असली मनुवादी वही लोग हैं जो पैसे को “सत्ता” ही नहीं मानते और इसलिए उसके बांटने की मुहिम को हमेशा दफन करते रहते हैं। इनसे सावधान रहिए। जो लोग यह मान के चलते हैं कि अपनी जाति के, अपने समाज के सभी लोग सुखी नहीं रह सकते उन्हें गधे की तरह लादी ढ़ोना पड़ेगा, केवल मेरा परिवार है और मैं हूं जिसको लादी नहीं ढ़ोना चाहिए।

यही सोच असली मनुवाद है। मनुवाद का संबंध किसी जाति से नहीं है, दलितों में खतरनाक मनुवादी हैं और पिछड़ी जातियों में खतरनाक मनुवादी हैं जो आस्तीन के सांप हैं। इनसे बचिये। और अपने समाज को बचाइए।

यही गलतफहमी श्री कांसीराम जी को थो। वह कहते थे कि सत्ता मास्टर चाबी है लेकिन यह नहीं जान पाए जिंदगी भर कि शासन की कुर्सियां सत्ता ही नहीं है। असली सत्ता तो पैसा है इसीलिए सत्ता मिलने के बाद भी 2% दलितों का भला हुआ। वही लोग, जिन को आरक्षण से नौकरी मिल गई और पैसा मिल गया। बाकी 98 परसेंट भांग के नशे में हैं। मायावती को यह बात समझ में आ गई इसलिए पैसा जमा करने में पूरी ताकत लगाई। लेकिन वह भी नहीं चाहती कि सभी दलितों को यह बात समझ में आ जाए। मायावती भी 24 कैरट कि मनुवादी है क्योंकि उसकी भी सोच यही है कि सब को सुख नहीं मिल सकता। सभी गधे बैकुंठ नहीं जाएंगे। 3% लोग बढ़िया-बढ़िया खाएंगे, तो उनसे जो पाखाना निकलेगा, जो 97 प्रतिशत सूअरों के काम आएगा।

यह भ्रम बड़े पैमाने पर फैला हुआ है कि आरक्षण असली सत्ता यानि पैसे में भागीदारी का उपाय नहीं है, नकली सत्ता यानी शासन के कुर्सियों में भागीदारी का उपाय है। इस भ्रम को दूर करने में आप मदद करेंगे तो अपने समाज का बहुत उपकार करेंगे आप।

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