Voters Party International History

2012 –

सन् 2012 में कन्नौज की जनता का मूड पूरी तरह समाजवादी पार्टी के विरुद्ध था। उसी समय संसदीय उपचुनाव की घोषणा हो गई। श्री भरत गांधी की टीम ने कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में अपना प्रत्याशी उतार दिया। किंतु सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को जनता के मूड का एहसास हो गया। सत्ताधारी पार्टी ने पुलिस और अपराधियों का इस्तेमाल करके वोटर्स पार्टी के प्रत्याशी और कुछ अन्य लोगों का अपहरण करवा लिया। चुनाव नहीं होने दिया। तत्कालीन कलेक्टर को और एसपी को डरा-धमकाकर निर्विरोध निर्वाचन का प्रमाण पत्र हासिल कर लिया। श्री गांधी के लिए यह नया अनुभव था। उन्होंने इस जुल्म के खिलाफ न झुकने का फैसला किया, हालांकि वह भलीभांति जानते थे कि प्रदेश के सबसे ज्यादा ताकतवर परिवार से लोहा लेना जान का जोखिम लेने से कम नहीं है। श्री गांधी ने उत्तर प्रदेश के हाई कोर्ट, भारत के सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में तत्कालीन मुख्यमंत्री और उनके अपराधिक सहयोगियो के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। इसका परिणाम वही हुआ, जिसकी आशंका थी। श्री भरत गांधी की जान को खतरा पैदा हो गया। तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार ने बड़ी-बड़ी अदालतों के आदेशों की अवहेलना करनी शुरु कर दी। श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने के लिए अदालत ने आदेश दिया, लेकिन उसको समाजवादी पार्टी की सरकार ने नहीं माना। श्री भरत गांधी और उनके सहयोगियों पर जगह-जगह हमले और अपहरण का सिलसिला शुरू हो गया। श्री भरत गांधी को उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करना मुश्किल हो गया। तब उन्होंने दिल्ली में रहकर उत्तर प्रदेश सरकार के अपराधों के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरु की। सन 2012 में एक बार फिर से श्री गांधी को और उनके सहयोगियों ने एक नए नाम से पार्टी बनाने की सलाह दी। अपराध की राजनीती से लड़ने के लिए जनता को विकल्प चाहिए था। वह विकल्प हमें देना ही था। इसलिए नई पार्टी का गठन किया गया, जिसका नाम रखा गया- वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल(वीपीआई)

2010 –

सन् 2010 में पार्टी के प्रेरणास्रोत श्री भरत गांधी और उनके समर्थकों ने यह देखा कि उन्होंने जो प्रयास किया, उसका लाभ समाजवादी पार्टी को मिल रहा है क्योंकि जनता के बीच उन्होंने कोई राजनीतिक विकल्प पेश नहीं किया। जबकि संसद में समाजवादी पार्टी के प्रमुख श्री मुलायम सिंह यादव भी वोटरशिप के विरुद्ध साजिश में शामिल थे। इस अनुभव के बाद सब की राय बन गई  कि हम लोगों को एक राजनीतिक पार्टी का गठन करना चाहिए। यद्यपि यह काम बहुत मुश्किल था। क्योंकि खरपतियों के इशारे पर नाचने वाली बड़ी राजनीतिक पार्टियों से सामना करना असंभव जैसा था। फिर भी  यह तय किया गया यह चुनौती  स्वीकार किया जाये। पार्टी का गठन किया गया, जिसका नाम रखा गया-वोटर्स पार्टी। यह तय किया गया कि पार्टी का पंजीकरण कुछ दिन तक नहीं कराया जाए। जिससे जन आंदोलन पहले पैदा हो और उससे निकले हुए लोगों को पार्टी का संस्थापक बनाया जाए। किंतु  श्री भरत गांधी के साथ  काम कर रहे  कुछ लोगों ने श्री भरत गांधी के साथ विश्वासघात किया। उन्होंने चुपके-चुपके  पार्टी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन भारत के चुनाव आयोग में कर दिया। हाईकोर्ट दिल्ली में मुकदमा चला। हाई कोर्ट ने सन् 2011 में आदेश दिया कि याचिका करने वाले हो सकता है कि पार्टी के वास्तविक संस्थापक न हों। किंतु याचिकाकर्ताओं ने चूंकि चुनाव आयोग का दरवाजा नहीं खटखटाया। इसलिए जिन लोगों ने खटखटाया, उनको पंजीकरण देने से हाईकोर्ट चुनाव आयोग को नहीं रोक सकती।

2009 –

2009 अमेठी रायबरेली के बाद श्री भरत गांधी और उनके समर्थक तत्कालीन केंद्र सरकार का अंदर से समर्थन कर रहे श्री मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की तरफ मुखातिब हुए और सन् 2008 के अक्तूबर महीने में लखनऊ विधानसभा के सामने 43 लोगों ने अनशन शुरू शुरू कर दिया। समाजवादी पार्टी के मुखिया से मांग किया कि वह संसद में बहस कराने के लिए कांग्रेस पार्टी को तैयार करें या कांग्रेस सरकार से अपना समर्थन वापस लें। क्योंकि वोटरशिप का मुद्दा विशुद्ध समाजवादी मुद्दा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया ने श्री भरत गांधी को आश्वासन दिया कि वह अपने समर्थकों को अनशन समाप्त करने के लिए कहें। ‘‘मैं आगामी संसद के सत्र में वोटरशिप पर बहस जरुर करवाऊंगा। बाद में सपा के मुखिया विश्वासघात कर गए। उन्होंने बहस कराने की बात तो छोड़िए, इस मामले में दोबारा से कोई संवाद करना भी ठीक नहीं समझा। इसके बाद श्री भरत गांधी और उनके समर्थकों ने यह तय किया कि जो काम उन्होंने अमेठी और रायबरेली में किया है, अब वही काम मुलायम सिंह के क्षेत्र में करेंगे। इस फैसले के बाद श्री भरत गांधी और उनके समर्थक कन्नौज चले गए और वहां गांव-गांव पदयात्राएं शुरू कर दीं। लगभग डेढ़ हजार गांव में वाल पेंटिंग की। श्री गांधी ने स्वयं केवल कन्नौज लोकसभा क्षेत्र में 42 जनसभाएं की। इससे क्षेत्र की जनता का मन बदल गया। समाजवाद के खिलाफ काम करने वाले श्री मुलायम सिंह को सबक सिखाने के लिए जनता चुनाव का इंतजार करने लगी। यह मौका सन् 2012 में तब आया, जब श्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सांसद पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी सीट खाली हो गई। कन्नौज की खाली सीट पर उनकी पत्नी डिंपल यादव को चुनाव लड़ने की घोषणा हो गई। श्री भरत गांधी के समर्थकों ने तय किया कि श्री मुलायम सिंह जी के बेटे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सीट पर अपना प्रत्याशी उतारा जाए। ऐसा ही किया गया।

2008 –

सन् 2008 में सांसदों का ऐतिहासिक ध्रुवीकरण देखकर तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रियरंजन प्रियरंजन दासमुंशी ने पार्टी श्री भरत गांधी को बुलाया और शास्त्री भवन में लंबी बातचीत की। अंत में वह भी वोटरशिप के समर्थक हो गए। उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से वोटरशिप के प्रस्ताव पर बहस करने के लिए हम तैयार हैं। आप लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी को तैयार करिए। श्री गाँधी ने श्री चटर्जी से बात की। उन्हें भी वोटरशिप का प्रस्ताव समझ में आ गया। उनसे यह तय हो गया कि लोकसभा में एक दिन नियम 193 के तहत बहस आयोजित की जाएगी। संसद भवन के इस फैसले के बाद पहली बार श्री भरत गांधी के इस प्रयास को पूरे देश के अखबारों ने हर भाषा में प्रमुखता से समाचार बनाया। इस खबर से यह समाचार पहली बार पार्टियों के अध्यक्षों तक और देश-विदेश के खरबपतियों और राजनयिकों  तक पहुंचा। फिर क्या था। एबी मानसिकता वाली क्रूर ताकतें हरकत में आ गयीं। संसद में बहस होने से सके एक दिन पहले सभी पार्टियों के प्रमुखों ने आपस में बात करके यह तय कर लिया की बहस रोकने के लिए संसद का आकस्मिक सत्रावसान कर दिया जाए। ऐसा ही हुआ। 8 मई 2008 को संसद का आकस्मिक सत्रावसान कर दिया गया। वास्तविक लोकतंत्र को धरती पर उतारने की कोशिश नाकाम कर दी गई और संसद से कुछ हो सकता है, यह आशा टूट गई। सन् 2008 में संसद भवन में देश के वोटरों के खिलाफ की गई साजिश पर श्री भरत गांधी ने पहली बार अपनी कलम उठाई और छोटी सी पुस्तक लिखी- ‘‘आर्थिक नरसंहार के खिलाफ महाभारत’’। इस पुस्तक ने जबरदस्त लोकप्रियता पाई। उसकी हजारों प्रतियां देखते ही देखते बिक गई। श्री भरत गांधी और उनकी टीम इस नतीजे पर पंहुची कि जनता की आर्थिक दुर्दशा के लिए सांसद और विधायक जिम्मेदार नहीं है। अपितु पार्टियों के अध्यक्ष जिम्मेदार हैं। जो पूरी तरह देश-विदेश के खरबपतियों के चंगुल में हैं। उनसे चंदा प्राप्त करने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए कठपुतली की तरह नाच रहे हैं। इसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। अब यह प्रमाणित हुआ है यह कठपुतली तंत्र है। इस नकली लोकतंत्र की पूरी कहानी को उन क्षेत्रों में आम जनता के बीच सुनाने का फैसला किया गया जहां-जहां से पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनाव लड़ते थे। अपनी इसी नीति के तहत श्री भरत गांधी और उनके समर्थक दिल्ली से अमेठी और रायबरेली चले गए। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सन् 2008 में कार्यालय खोला। वहां लगभग ढाई हज़ार गांवों में पैदल यात्रा करके उनके समर्थकों ने संसद की पूरी कहानी अमेठी और रायबरेली की जनता को बताया। स्थानीय जनता से जबरदस्त समर्थन प्राप्त हुआ। एक अक्टूबर और 14 नवम्बर, 2008 को श्री गांधी की दो विशाल जनसभाएं संपन्न हुई।

2005 –

सन् 2005 में पार्टी के श्री भरत गांधी ने दिल्ली में एक छोटी सी टीम बनाई। सांसदों के घर-घर जाकर राजनीतिक सुधारों और वोटरशिप के अधिकार के फायदे और इन प्रस्तावों को लागू करने के व्यावहारिक पहलुओं पर बातचीत शुरू की। 2007 तक लगभग 300 से ज्यादा सांसद श्री भरत गांधी के समर्थन में आ गए। श्री भरत गांधी के वोटरशिप के प्रस्ताव को एक याचिका के रूप में संसद में पेश करने का सिलसिला शुरू हो गया। रोजाना समर्थक सांसदों की संख्या बढ़ती जाती थी। नोटिस देने वाले सांसदों की लाइन लगने लगी। संसद में आए दिन बहस के दौरान प्रसंगवश वोटरशिप के प्रस्ताव के कुछ हिस्से को सांसदों ने कोट करना शुरु कर दिया। यह तय किया कि सरकार पर वोटरशिप के प्रस्ताव पर बहस कराने के लिए दबाव डाला जाए। सांसदों ने श्री भरत गांधी से निवेदन किया कि बहस के लिए सांसदों को तैयार करें। संसद में बहस की तैयारी के लिए सांसदों के साथ श्री भरत गांधी की गोष्ठियों की सिलसिला शुरू हो गया। संसद की कार्यवाही के बाद शाम को दर्जनों सांसद श्री भरत गांधी के बुलावे पर किसी ने किसी सांसद के निवास पर पहुंचते थे और रात में 8 बजे से लेकर 11 बजे तक वह श्री भरत गांधी की बात सुनते थे। तर्क-वितर्क करते थे और वोटरशिप के माध्यम से वास्तविक लोकतंत्र को अमलीजामा पहनाने के लिए अध्ययन करते थे। यह सिलसिला सन 2006 से अप्रैल 2008  तक चला।

2002 –

सन् 2002 से लेकर सन 2004 तक 3 वर्षों में पार्टी श्री भरत गांधी ने मेरठ व बिहार में एक हजार से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया। जिसमें उनको अपार समर्थन मिला। यह प्रमाणित हो गया जिन राजनीतिक सुधारों की रूपरेखा उन्होंने एकांतवास में तैयार की थी, उसके प्रति जनता का विशाल जन समर्थन है। बिहार में चंपारण के टाउन हॉल में जब वह बोल रहे थे तो प्रश्नोत्तर सत्र में जीर्ण शीर्ण सैकड़ों सुराखें वाली बनियान पहने एक किसान ने उनसे सवाल किया। उसने पूंछा कि  ‘‘इतने बड़े देश में अगर आप जगह-जगह जाकर लोगों को समझाएंगे तो बहुत वक्त लगेगा। इस बीच गरीबी से लाखों लोग मर जाएंगे’’। उसने कहा कि ‘‘आप यह बात दिल्ली के सांसदों को क्यों नहीं समझाते? अगर वह समझ गए तो कानून बन जाएगा और अगर वह लोग विरोध करेंगे तब जनता की भूमिका आएगी’’। चंपारण के उस किसान के बात श्री भरत गांधी को पसंद आई उन्होंने मेरठ छोड़कर दिल्ली जाने का फैसला किया और यह तय किया कि अब वह अपनी बात आम जनता को बताने के बजाय सांसदों को बताएंगे। इस तरह सन् 2005 में शुरू हुआ सांसदों को समझाने का अभियान।

2001 –

सन् 2001 में 20 जनवरी को श्री भरत गांधी को मेरठ के जिलाधिकारी के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया। कारण केवल इतना था मेरठ में स्थित कताई मिल मजदूरों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के योजना के तहत बाध्य किया गया कि वे सरकार से पैसा लेकर नौकरी छोड़ दें। मजबूर होकर श्रमिक ऐसा करने को तैयार हो गये। किंतु एक उच्चस्तरीय साजिश के तहत उनको धोखा दे दिया गया। उनको जो चेक दिया गया, उसमें उनके स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के नियमानुसार जो पैसा बनता था उसका दो या चार परसेंट रकम ही लिखा गया और तत्कालीन कलेक्टर, तत्कालीन उद्योग सचिव व तत्कालीन स्थानीय विधायक ने संयुक्त रुप से जबरदस्ती उनके मकानों में ताला डाल दिया। श्री भरत गांधी के समक्ष यह दुखड़ा मिल कर्मचारियों ने रोया और बताया कि ठिठुरती ठंड में वे लोग गत एक सप्ताह से अपने घरों के बाहर बैठकर समय काट रहे हैं। कालोनी की झोपड़ियों को जला कर रात काट रहे हैं। कॉलोनी की बिजली काट दी गई है। पानी का कनेक्शन बंद कर दिया गया है। मकानों में ताली मारकर चाभी कलेक्टर ने मंगवा लिया है। सामान उठाकर घर ले जाने के लिए चार-छह हजार रूपये के चेक दिए हैं। वह पैसा भी भुगतान करने से बैंक मैनेजर को रोक दिया गया है। वह न तो घर जा सकते हैं, न तो कम्पनी परिसर में रह सकते हैं। यह अत्याचार देखकर पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री भरत गांधी ने कहा कि मैं कलेक्टर से बात करने के लिए जा रहा हूं। आप दो चार लोग मेरे साथ चले चलिए। लेकिन वहां ढाई हजार को श्री गांधी के साथ हो लिये। तीन घंटे की पैदल यात्रा के बाद कलेक्टर निवास पहुंचे। सभी लोग ठिठुरती ठंड से परेशान थे। स्थानीय चौकीदार को गेट खोलने को कहा। उसने नहीं खोला। कुछ मजदूर गेट को जबरदस्ती खोल दिए और सभी लोग अंदर जाकर कलेक्टर का इंतजार करने लगे। सरकारी कर्मचारियों ने कलेक्टर को खबर कर दिया कि उनका मकान कब्जा हो चुका है और उनका परिवार मकान छोड़कर भाग चुका है, तख्तापलट की कार्यवाही हो गई है….। कलेक्टर ने एसपी को फोन किया और लाठीचार्ज करने का आदेश दिया। ऐसा ही हुआ। श्री भरत गांधी ने  सुबह सिर्फ पानी भी नहीं पिया था। उनको गंभीर चोटें आई और बेहोशी की अवस्था में उनके हाथ में हथकड़ी लगाई गई और हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां रात में 1र.00 बजे उनको होश आया। उनको सुबह को जेल भेज दिया गया और कुछ दिन बाद आतंकवादी करार देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्यवाही कर दिया गया। जिसके तहत वह जेल से बाहर नहीं आ सकते थे। जेल जाकर उन्होंने फैसला कर लिया कि वह केवल जीने के लिए के एक रोटी खाएंगे और उन्हें गलत ढंग से गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ जेल में सत्याग्रह करेंगे और अपने साथ गिरफतार किये गये 32 लोगों को छुड़ाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने यह भी संकल्प लिया कि न तो वह अदालती प्रक्रिया में झूठ बोलेंगे, न ही पैसा खर्च करेंगे और ना ही कोई वकील करेंगे। रासुका कानून के तहत हाईकोर्ट के तीन जजों का उच्चस्तरीय आयोग मामले की जांच करने के लिए बनाया गया। जिसके सामने श्री भरत गांधी ने सारी बात सच-सच बता दिया। हाईकोर्ट के उच्च स्तरीय आयोग ने श्री भरत गांधी को 3 महीने बाद बाइज्जत बरी किया और प्रदेष के राज्यपाल से सिफारिष कर दिया कि श्री भरत गांधी को जेल से छोड़ दिया जाय। अगले दिन स्थानीय अदालत में जो मुकदमा चल रहा था, उसमें भी अदालत ने फैसला सुना दिया और यह आदेश दिया कि श्री भरत गांधी सहित जेल में बंद 32 लोग बेकसूर है। उनको साजिश करके जेल में भेजा गया है। इसलिए एफआईआर करने वाले तत्कालीन कलेक्टर के स्टेनोग्राफर के खिलाफ अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर मुकदमा दर्ज कर लिया और मुकदमा निरस्त करते हुये श्री भरत गांधी सहित 32 लोगों को जेल से रिहा करने का आदेश कर दिया। बाद में इस मामले पर श्री भरत गांधी ने हाईकोर्ट में के कलेक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया।

2000 –

सन् 2000 में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने संविधान में कमियों की जांच पड़ताल करने के लिए एक आयोग बनाया। उस आयोग के द्वारा देश के संविधान में मूल ढांचे में कोई छेड़छाड़ न हो सके और उत्थान की बजाए पतन की ओर देश को न ले जाया जा सके, इसके लिए पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री भरत गांधी के नेतृत्व में संविधान समीक्षा के लिये एक निजी कमेटी बनाया गया। भारत के संविधान की समीक्षा रिपोर्ट तैयार करके श्री भरत गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से चर्चा की। श्री वी. पी. सिंह जी ने इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री श्री इंद्रकुमार गुजराल से चर्चा किया और निवेदन किया कि भरत गांधी को लेकर वह तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के आर नारायणन के पास जाएं और पूरे मामले से राष्ट्रपति को परिचित कराएं ऐसा ही हुआ राष्ट्रपति ने श्री भरत गांधी के प्रयासों को सराहा और कहा कि इस संविधान के संशोधन के प्रस्ताव पर उनके कार्यालय को सीमित अधिकार है लेकिन जो कुछ भी संभव होगा, वह अवश्य करेंगे।

1999 –

सन् 1999 में वोटरषिप अधिकार दिलाने के लिए पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री भरत गांधी के बुलावे पर मेरठ में एक सर्वोदय नेता व उद्योगपति श्री कृष्ण कुमार खन्ना के आवास पर स्थानीय समाजसेवकों की एक छोटी सी बैठक हुई और इस बैठक में एक संगठन बना। जिसका नाम रखा गया-आर्थिक आजादी आंदोलन परिसंघ। कारण यह था 1 साल पहले 14 दिन के अनशन के कारण मेरठ के तमाम लोग श्री भरत गांधी के संपर्क में आ गए थे और उनका एकांतवास समाप्त हो चुका था। उनमें से कई लोग इस पक्ष में थे कि श्री गांधी को गोपनीय रहकर लिखने-पढ़ने की बजाए जो कुछ लिखा पढ़ा है उसके प्रचार प्रसार में समय देना चाहिए। यह संगठन लगातार बढ़ता गया। पहले कुछ समय तक स्थानीय मीडिया ने अनसुना किया। किंतु बाद में स्थानीय मीडिया ने भी इस संगठन के समाचार देने शुरू कर दिया। बाद में  2005 में इसी संगठन की ओर से संसद सदस्यों के बीच वोटरषिप के लिये अभियान चलाया गया।

1998 –

सन् 1998 में वोटरशिप की खोज होने के बाद पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री गांधी ने मेरठ के एक गांव में 8 महीने तक रोजाना सर्वेक्षण किया। गांव के उस परिवार में एक-एक सदस्य के सामने वोटरशिप का विचार रखा और वोटरशिप पर उनकी प्रतिक्रिया जानी। यह आश्चर्यजनक था कि जो प्रतिक्रिया उस एक गांव के लोगों की की थी, वही प्रतिक्रिया बाद में पूरे संसद सदस्यों की देखने को मिली. इसी बीच एक जुलाई 1998 को मेरठ में गरीबी के कारण एक किसान परिवार के मुखिया ने अपने दोनों बच्चों को जहर दे दिया, अपनी पत्नी को जहर दे दिया और खुद भी जहर खा कर मर गया. 8 साल की बच्ची को डॉक्टरों ने हॉस्पिटल में बचा लिया। यह खबर अखबारों में प्रमुखता से छपी. खबर पढ़कर पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री भरत गांधी को ऐसा लगा कि जैसे उनकी मौत के लिए जिम्मेदार वह स्वयं है। क्योंकि अगर वोटरशिप का अधिकार मिल चुका होता तो यह परिवार गरीबी से न मरता। उन्होंने पूरे दिन उनको भूख नहीं लगी। अगले दिन भी भोजन नहीं किया। तीसरे दिन भी भूखे रहे। चौथे दिन भी भोजन करने  से मना कर दिया। पांचवें दिन मामला गंभीर हो गया। उनकी जान पहचान के लोगों ने बहुत पूछताछ की तब उन्होंने कारण बताया। वह राजनीतिक लोग थे। इसलिए उन्होंने इसको अनशन माना और स्थानीय जिलाधिकारी को इसकी खबर करते हुये बता दिया कि श्री भरत गांधी चाहते हैं कि मां-बाप के मर जाने के बाद राष्ट्रपिता की ओर से जीवित बच गई बालिका को उसके खाते में देष की औसत आय की आधी रकम रू. 1750 प्रति माह दिया जाये। उनके जान पहचान के लोगों ने श्री भरत गांधी को एकांतवास से ले जाकर कलेक्टर कार्यालय के समक्ष बैठा दिया। इस प्रकार पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री भरत गांधी का व्यक्तिगत प्रायश्चित एक राजनीतिक अनशन में बदल गया। जब कलेक्टर को बात पता चली तो उसने क्रोध में आकर कहा कि हम कुछ नहीं करेंगे। मरना हो तो मर जाओ। इसके बाद छठवां दिन बीता। सातवां दिन, आठवां दिन और नौवां दिन बीता। दसवें दिन सरकारी डॉक्टरों की टीम ने रिपोर्ट लगा दिया कि यह अनषनकारी आदमी कभी भी मर सकता है। इसके बाद कलेक्टर के कहने पर रात में 11 बजे श्री भरत गांधी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और हॉस्पिटल ले जाकर जबरदस्ती खाना खिलाने के लिये व ग्लूकोज लगाने की  कोशिश की। श्री गांधी ने पुलिस की एक न सुनी। हारकर पुलिस वालों ने लाठियों से पीटने और बिजली का करंट लगाकर खाना खिलाने के लिये थाने वापस ले गये किंतु श्री गांधी से बात करके थाना अध्यक्ष की राय बदल गई। उसने श्री गांधी को यातनाएं न देने का फैसला किया और अपने ऊपर के अधिकारियों को बता दिया कि हम अपनी नौकरी से इस्तीफा दे सकते हैं लेकिन इस आदमी को यातनाएं नहीं नहीं दे सकते। पुलिस ने श्री गांधी को रात 2 बजे कचहरी ने उसी जगह छोड़ दिया, जहां से उठाया था। अनशन के 11 दिन बीता। बारवां दिन बीता। तब जाकर अखबारों ने इस खबर को छापा। क्योंकि इस खबर को देने के लिए कलेक्टर ने अखबार वालों को बोला। खबर पढ़ने के बाद वहां के स्थानीय विधायक मौके पर पहुंचे और तत्कालीन को केंद्र सरकार के कृषि मंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई तक यह मामला पहुंचाया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक लाख रूपये का चेक उस लड़की के नाम से मंजूर किया, जो लड़की आत्महत्या कर गए परिवार में जीवित बच गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अनशनकारी भरत गांधी को संदेष भेजते हुये कहा कि वह लड़की के लिए राष्ट्रपिता की ओर से 1750 रूपया हर महीना जीवन-यापन भत्ता मांग रहे हैं। एक लाख रुपया बैंक में जमा होगा तो 18 प्रतिशत ब्याज की दर से 18 सौ रुपए हर महीने लड़की को मिलेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पार्टी के प्रेरणाश्रोत श्री गांधी से निवेदन किया कि उनकी मांग मान ली गई है, इसलिये वह अनशन समाप्त कर दें। श्री भरत गांधी ने 14 दिन बाद अनशन समाप्त किया। अब उनके सामने केवल पर एक लड़की को ही नहीं, हर वोटर को वोटरशिप अधिकार दिलाने की चुनौती थी।

1997 –

1997 के गर्मी के दिनों से श्री भरत गांधी सुबह-सुबह मजदूर बाजार जाने लगे क्योंकि उन्होंने किसी अखबार में पढ़ा कि देश में वाइट कालर जाब यानी सरकारी नौकरी की मांग करने वाले लोग बहुत हैं लेकिन देश में प्राइवेट सेक्टर में काम करने वालों की भारी किल्लत है वहां काम करने के लिए आदमी नहीं मिल रहे हैं श्री भरत गांधी ने जब अखबार में यह बात बढ़ी तो उन्हें लगा कि शायद उनका कई साल पुराना प्रश्न का उत्तर मिल गया है उन्हें लगा कि मजदूर बाजार में जाकर अगर वह मजदूरी का काम करते हैं तो शायद किसी की रोजी रोटी नहीं छीनी गई और उन्हें अपने लिए रोजी-रोटी मिल ही जाएगी इस तरह वह अपने लिए आय का जरिया पैदा कर सकेंगे बिना अपना संकल्प तोड़े किंतु ऐसा नहीं हुआ मजदूर बाजार में लगभग 3:30 महीने जाने के बाद पता चला कि वहां स्थिति और विकराल है मजदूर सुबह 6:00 बजे आ जाते हैं और 11:00 बजे अपने घर पर वापस चले जाते हैं उन्हें वहां भी काम नहीं मिलता श्री भरत गांधी को जब यह पता चला तब उनके दिमाग में अचानक यह बात कौन थी कि सारी समस्या की जड़ मशीनें हैं और मशीनों की भूमिका पर अर्थव्यवस्था में पर्याप्त चिंतन नहीं हुआ है उन्हें बिजली की तरह यह बात कही गई कि मशीनो ने लोगों के रोजगार छीन लिए हैं और मशीनों की मजदूरी मशीन मालिकों और मशीन की फैक्ट्री आ रही है अगर मशीन की मेहनत और मजदूरी की गणना कर ली जाए और उसे मजदूरों में बांट दिया जाए या नहीं बेरोजगार लोगों में बांट दिया जाए तो बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो जाएगी और लोगों को पैसा भी मिल जाएगा इस तरह से मशीनों की मेहनत yeh dil लोगों में बांटी जाए तो इसे वोटर पेंशन कहा गया बाद में इसी को वोटरशिप कहा गया।

1996 –

सन 1996 में श्री भरत गांधी मेरठ पहुंचे उनके सामने चुनौती थी के विधानसभा और भारत की संसद को सहमत कैसे किया जाए लेकिन इसके पहले चुनौती यह थी कि संसद तो बड़ी चीज है अपने आसपास के लोगों को सहमत क्यों किया जाए कैसे किया जाए तरह-तरह के मतभेद आसपास के लोगों को ही सहमत नहीं होने देते थे जब तक मतभेदों का प्राकृतिक कारण और जीव वैज्ञानिक कारण ना पता चल जाए तब तक सब को समझाया नहीं जा सकता था और जब तक बड़े पैमाने पर लोगों को समझाया ना जा सके तब तक संसद को और विधानसभाओं को भी समझाना असंभव था इस चुनौती से जूझते जूझते श्री भरत गांधी शमशान जाने लगे क्योंकि वहां एकांत भंग होने का खतरा नहीं था लेकिन भीड़ भी मिल जाती थी मत भेज दो का वास्तविक कारण क्या है मतभेदों की प्राकृतिक वजह क्या है मतभेदों का जीव वैज्ञानिक कारण क्या है इस तलाश में लंबे समय तक श्री भरत गांधी भटकते रहे बहुत लोगों से मुलाकातें की लेकिन कहीं जवाब नहीं मिला आईएएस की तैयारी के दौरान उन्होंने बहुत सारे विषयों को चौक बस पड़ा था उनमें भी कहीं जवाब नहीं मिला और अखबारों को गंभीरता से पढ़ने की आदत थी वहां भी जवाब कहीं नहीं मिला विश्वविद्यालयों के कई प्रोफेसरों के संपर्क में आए लेकिन इस प्रश्न का संतोषजनक जवाब कहीं नहीं मिला धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में महारत हासिल किए हुए लोगों से भी मुलाकात की किंतु वहां भी इसका जवाब नहीं मिला थक हार कर उन्हें एक समय है ऐसे लगने लगा कि शायद उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता और उन्हें अपने संकल्पों को भंग करना पड़ेगा इधर परिवार से आर्थिक सहयोग मांगना उन्होंने बंद कर दिया था और आर्थिक तंगी के गंभीर घुटन से गुजर रहे थे यहां तक कि एक छोटे से रोका कई महीनों तक किराया नहीं दे पाए इसलिए उन्हें वह छोटा सा रुम भी छोड़ कर अपने छोटे भाई के हॉस्टल में उसके रूम में जाकर रहना पड़ा किंतु मेरठ आपने प्रभास संसार के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ हालांकि स्वयं पार्टी के संस्थापक श्री भारत गांधी के लिए वह एक भयावह सुकून था आर्थिक तंगी के जिस दारुण पीड़ा से उन्हें गुजरना पड़ा ऐसा उन्होंने जीवन में कभी नहीं देखा था उनका संकल्प था कि वह किसी की रोजी रोटी छीन कर अपना रोजगार नहीं करेंगे और अपने लिए आय का जरिया नहीं बनाएंगे एक वक्त ऐसा भी आया जब उनका यह संकल्प टूटते टूटते बचा उन दिनों जब वह श्मशान पर दिन में जाया करते थे रात में उन्हें सपने आने लगे और उस सपने में है उन्हें अपने दिन भर के प्रश्नों की गुत्थियां समझने लगी लेकिन वह सुलेशन आकृति के रूप में होते थे वह 2:00 बजे 3:00 बजे रात उठ जाया करते थे और जिन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला होता था सपने में उसका डायग्राम बना देते थे और बना कर सो जाते थे यह सोच कर कि सुबह उठकर उसको एक्सप्लेन करेंगे यह प्रक्रिया 1997 चलिए और 98 चली यहां तक कि 1999 में भी कुछ समय तक चली मतभेदों का वास्तविक कारण क्या है यह उत्तर उन्हें सांसारिक पुस्तकों में तो नहीं मिला किंतु सूखने के माध्यम से जो एहसास उन्हें हुआ उससे उनको इस प्रश्न का उत्तर मिल गया लेकिन इस प्रश्न का उत्तर के साथ एक बहुत विश्व ज्ञानपुंज भी उन्हें मिला जिसे वह लगातार लिपिबद्ध करते गए और वह कितने पृष्ठों में समा गया कि उसको छपवाना मुश्किल हो गया यहां तक कि उन्होंने कई हजार पृष्ठ जो उन्हें सपने पता चले थे एक कंप्यूटर टाइपिस्ट से टाइप करवाया इस उम्मीद में कि उसके टाइप का खर्च कोई-न-कोई मिलेगा और दे देगा लेकिन ऐसा ना कर सके एक दिन टाइपिस्ट ने दुखी होकर लगभग डेढ़ साल का जितना भी टाइप मैसेज मिलता है उसको अपने कंप्यूटर से डिलीट कर दिया क्योंकि उसे पैसा नहीं मिला किंतु कंप्यूटर से पहले ही डिलीट हो गया श्री भरत गांधी के मस्तिष्क सेवा डिलीट नहीं हुआ और पांडुलिपियों में वह आज भी मौजूद है श्री भरत गांधी को स्वप्न में जो बातें पता चले वह उनके भविष्य के चिंतन का आधार बनी बाद में उन्होंने जितने भी राजनीतिक सुधारों संबंधित प्रस्ताव तैयार किए वैज्ञानिक सुधारों संबंधी प्रस्ताव तैयार किए धार्मिक और सांस्कृतिक सुधारों संबंधित प्रस्ताव तैयार की है उन सब का स्रोत वही ज्ञान है जिसको बाद में उन्होंने एक शब्द दिया-  जीरोपैथ। जीरोपैथ के ज्ञान पर ही श्री भरत गांधी की एक पुस्तक पैदा हुई जिसका नाम रखा गया जन उपनिषद यही जन उपनिषद नामक पुस्तक और उसका दर्शन बाद में वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल का सिद्धांत बना।

1993 –

सन 1993 मैं जब इस होनहार दार्शनिक छात्र ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला किया तो अपने परिवार के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि वह शादी विवाह नहीं करेगा और वह आईपीएस नहीं बनेगा। उसने यह भी कहा कि वह कोई दूसरा रोजगार भी तब तक नहीं करेगा जब तक उसे कोई ऐसा काम नहीं मिल जाता जिससे किसी दूसरे का रोजगार छिने नहीं और दूसरे की रोजी-रोटी छिने नहीं। अपने परिवार के इस होनहार बालक की बात सुनकर परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, क्योंकि इस परिवार ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर इस बच्चे को पढ़ाया था और उसकी प्रतिभा को देखकर यह उम्मीद पाला था कि यह बच्चा एक दिन इस परिवार के सारे कष्टों को हर लेगा किंतु परिवार ने इस बालक के इतने गंभीर और आत्मघाती फैसले का साथ देने का फैसला किया क्योंकि इस बालक को बचपन से जानते थे कि उसने कभी कोई गलत फैसला नहीं लिया।

1994 –

सन् 1994 में श्री भरत गांधी ने अपनी 25 साल की उम्र में शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने के लिए एक स्वैच्छिक संगठन पंजीकृत कराया। जिसका नाम रखा- नेशनल फाउंडेशन ऑफ एजुकेशन एंड रिसर्च, नेफर। इस संगठन ने देखते-ही-देखते इलाहाबाद में ख्याति हासिल कर ली। इलाहाबाद की मीडिया में 1994 और पंचानवे में लगभग प्रत्येक सप्ताह 2 कालम से लेकर 8 कलम तक की खबरें आने लगीं। दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, अमृत प्रभात, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, न्यूज़लीड जैसे तमाम राष्ट्रीय और स्थानीय अखबार श्री भरत गांधी द्वारा किए जा रहे शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव सुझाव से अभिभूत थे। और लगातार 2 वर्षों तक समाचार प्रकाशित करते रहे थे। किंतु शिक्षा विभाग ने केवल इसलिए शैक्षिक सुधारों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि श्री भरत गांधी की उम्र बहुत कम थी और वह एक लाइसेंसी शिक्षाविद नहीं थे। जब उनके द्वारा खोजे गये शैक्षिक सुधारों को लागू करने की बात आई तो उन सुधारों के लिए संसदीय मंजूरी जरूरी हो गई। साथ ही कम से कम देश की दो तिहाई विधानसभाओं से मंजूरी भी आवश्यक हो गई। श्री भरत गांधी के हाथ उन दिनों बहुत छोटे थे। संसद से मंजूरी प्राप्त कर पाना और विधानसभाओं से मंजूरी प्राप्त कर पाना उनके लिए संभव नहीं था। अब एक ही रास्ता था कि नामी-गिरामी अपने एनजीओ के नाम से सरकार से फंड मंजूर करवाएं और अपनी रोजी रोटी का इंतजाम करें। दूसरा रास्ता यह था कि वह हिम्मत ना हारें और कोई ऐसा रास्ता निकालें जिससे संसदीय मंजूरी मिल सके और विधानसभाओं की मंजूरी मिल सके। उस समय तक श्री भरत गांधी की उम्र 26 साल थी। उन्होंने दूसरा रास्ता अख्तियार किया। यह सोचना शुरू किया कि उनके सुधार संबंधी प्रस्ताव को संसद से मंजूर कराने के लिए और विधानसभाओं से मंजूर कराने के लिए उन्हें क्या करना होगा? इस चिंतन के परिणाम स्वरुप कौन यह बात समझ में आई कि संसद और विधानसभाओं को समझाने के लिए केवल शिक्षा में सुधार पर्याप्त नहीं है, आम जनता का दुख दर्द समझना होगा और कोई ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे देश का आवाम उनकी बातों को पसंद करें और उनकी बातें बड़े राजनीतिक दल मानने लगे और संसद में उनके भविष्य के सुधार संबंधी प्रस्ताव को और शिक्षा में सुधार संबंधी प्रस्ताव को संसद और विधानसभाओं की मंजूरी मिल जाए। यह समझ में आया कि उन्हें आम जनता के तकलीफों का कारण और उसका निवारण सोचने और लिखने के लिए एकांत चाहिए और एकांत की तलाश में उन्होंने अपनी लोकप्रिय कर्मभूमि इलाहाबाद को छोड़कर 1996 में मेरठ चले गए, जहां उनका छोटा भाई एमबीबीएस का कोर्स कर रहा था।

1993 –

सन 1993 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का एक छात्र भरत गांधी, जो बाद में पार्टी का संस्थापक बना बना, वह  आईएएस बनने के लिए कर रहे पढ़ाई को छोड़ दिया। कारण यह था उनके साथी IAS की अंतिम परीक्षा में असफल हो गए थे और उनके परिवार में करुण क्रंदन चल रहा था। यह देख कर उन्होंने सोचा कि यदि मैं IAS बनता हूं तो मैं भी किसी न किसी परिवार के करुण क्रंदन का कारण बनूंगा। और किसी दूसरे का रोजगार छिन जाएगा। लोगों की बेरोजगारी की पीड़ा से आहत होकर श्री गांधी ने औपचारिक शिक्षा छोड़ दीया और स्वयं बेरोजगार रह कर बेरोजगारी का समाधान तलाशने का फैसला किया।