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भाजपा के विरुद्ध विपक्षी एकता के लिए बने गठबंधन की संविधान सभा

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2024 के संसदीय चुनाव अब केवल कुछ महीने दूर हैं। बड़े बड़े मोदी विरोधी चेहरे डरे-सहमे मोदी के जन विरोधी कामों की सूची बताकर मोदी विरोध की रस्म निभा रहे है. ये लोग अपने निजी स्वार्थ के कारण एक व्यवस्थित, लोकतांत्रिक और पारदर्शी गठबंधन नहीं बना पा रहे है. ये लोग फिर वही गलती दोहराने जा रहे है जो गलती जय प्रकाश आन्दोलन के बाद सत्ता लोभी नेताओं ने 1977 में किया था. इसलिए हममें और आप में से कुछ लोग अब मूकदर्शक बनकर 2024 का चुनाव को नहीं देखना चाहेंगे. आगामी चुनावों में हस्तक्षेपकर्ता बनगे। हमें इस उद्देश्य से हस्तक्षेप करना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाओं, राजनीतिक मर्यादाओं और देश के भाई चारे को तहस-नहस करने वाली भ्रष्ट और घोटालेबाज सरकार 2024 के चुनाव में वापस न आ सके। 2024 में देश में ऐसी सरकार आये, जो देश के आम जान मानस की मांग पर काम करे.

परंपरागत गठबंधन से नहीं हटेगी भाजपा, क्यों?

कुछ पार्टियों के अध्यक्ष अपनी आपस में बैठक करते हैं और गठबंधन बनाने की घोषणा कर देते हैं। आमतौर पर गठबंधन बनाने की यही परंपरा रही है। किंतु इस तरह बना हुआ कोई गठबंधन भाजपा को केंद्र की सत्ता से नहीं हटा सकता। इस तरह से जो गठबंधन बनते हैं, उसके पीछे पार्टी अध्यक्षों की नियति राष्ट्र निर्माण की नहीं होती। दलों के अध्यक्षों की नियति आत्म सुरक्षा, धन संचय और अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने की होती है। इसलिए प्रायः ऐसे गठबंधन बनाने वाले लोग जनता को चुनाव के पहले यह नहीं बताते कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि "चुनाव के बाद देखा जाएगा"। सभी दलों के अध्यक्ष प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनने के लालच में चुनाव के दौरान उसी तरह काम करेंगे, जैसे गाजर की लालच में गधा भारी वजन ढ़ोता रहता है। आम जनता को यह बात समझ आ जाती है कि "पार्टियों के अध्यक्ष अपनी-अपनी लालच के वशीभूत चुनाव लड़ रहे हैं और चुनाव जीतने के बाद देश को लूटेंगे"।


इस सोच के कारण पार्टियों के अध्यक्षों के बीच तो गठबंधन बन जाता है, लेकिन पार्टियों के समर्थकों के बीच गठबंधन नहीं बन पाता। ऐसी स्थिति में समर्थक अपनी अंतरात्मा की आवाज पर और नैतिकता बोध के आधार पर वोट देते हैं। चूंकि भाजपा के पास प्रचंड मीडिया शक्ति है। इसलिए विपक्षी दलों के समर्थकों के बीच नैतिकता बोध पैदा करने का काम खुद भाजपा करेगी। भाजपा के विरोध में काम कर रहे पार्टी अध्यक्षों की स्वार्थी नियति को भाजपा अपने प्रचंड मीडिया शक्ति से जोर-शोर से प्रचारित करेगी। इससे प्रायः आम जनता में यह धारणा बन जाती है कि "सभी चोर इकट्ठे हो गए"। यानी अब जनता का कर्तव्य बनता है कि वह चोरों के झुंड के खिलाफ खुद लड़े। भाजपा को चोरों से लड़ने के लिए अकेले न छोड़े। जब जनता में यह दृष्टिकोण हो तो विपक्षी गठबंधन के धक्के से भाजपा सत्ता की कुर्सी से कैसे गिरेगी?


इसके विपरीत सोचिए। यदि भाजपा के विपक्ष में काम करने वाले सभी पार्टियों के अध्यक्ष किसी एक पार्टी के अध्यक्ष को चुनाव के पहले प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित कर दें। तब स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। तब भाजपा अपने मीडिया की प्रचंड शक्ति का प्रहार उसी एक व्यक्ति पर करके उसकी छवि को उसी तरह नष्ट कर देगी जैसे उसने राहुल गांधी और महात्मा गांधी की छवि को नष्ट किया। ‌ हां यदि पूरा विपक्ष किसी अनजान व्यक्ति का चेहरा सामने करके चुनाव लड़ जाए तो भाजपा का अस्त्र और शस्त्र निरर्थक हो सकता है। किंतु विपक्ष ऐसा कदापि नहीं करेगा, क्योंकि सत्ता और विपक्ष दोनों जगहों पर महात्मा लोग राजनीति नहीं कर रहे हैं। राजनीति में स्वार्थी और महत्वाकांक्षी लोग जाते हैं। निष्कर्ष यह है कि परंपरागत तरीके से बना गठबंधन भाजपा को केंद्र की सत्ता से नहीं हटा सकता।


भाजपा को हटाने का तरीका क्या होगा?

हमारी मान्यताएं यह है कि भाजपा आर्थिक संसाधनों से संपन्न एक कैडर आधारित पार्टी है. इस पार्टी में लोकतंत्र भले ही न चलता हो, किन्तु चलता हुआ दिखाई पड़ता है. इसलिए भाजपा को परंपरागत गठबंधनों से हटाया नहीं जा सकता। यदि चमत्कार हो, भाजपा 2024 में सत्ता से हट जाये, तो भी विपक्षी गठबंधन की नई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए - यह असंभव नहीं, तो मुश्किल अवश्य है. 2024 में मोदी के वापस आने के खतरे से लोगों को आगाह किया जाना जरूरी है. किन्तु केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है. आदर्श रूप से, कैडर आधारित पार्टी का सामना कैडर आधारित पार्टी से किया जाना चाहिए; गठबंधन और करिश्माई नेतृत्व का सामना करिश्माई नेतृत्व से नहीं होना चाहिए, न कि एक साधारण और पारंपरिक नेतृत्व से। जब तक भाजपा विरोधी सभी पार्टियों में आपस में मिलकर एक पार्टी बन जाने की समझ पैदा न हो, तब तक भाजपा का मुकाबला करने के लिए एक गठबंधन बनाना चाहिए। किन्तु यह गठबंधन केवल पार्टी अध्यक्षों द्वारा नहीं, अपितु सभी पार्टियों के नीचे के कैडरों द्वारा भी बनाया जाना चाहिए। यानी यह पार्टी और गठबंधन के बीच की चीज़ होना चाहिए और इस गठबंधन का उद्देश्य परंपरागत गठबंधनों से अलग होना चाहिए. गठबंधन का सक्षम संविधान बनाना और विपक्ष के आपसी अंतर्विरोधों का समाधान निकालना बौद्धिक रूप से शीर्षस्थ लोगों का काम है. ये लोग सक्षम संविधान बना कर भाजपा विरोधी सरकार बनाने में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकते हैं. इस गठबंधन में सिविल सोसायटीज और सामाजिक आन्दोलनों को भी जुड़ने का मौका मिलाना चाहिए।

चरणबद्ध तरीके से गठबंधन का विस्तार

पहले चरण में छोटे व‌ मझोले सामाजिक संगठन और राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख लोग एक मंच पर एकजुट हों। दूसरे चरण में देशभर के यथासंभव सभी भाजपा विरोधी पार्टियों के प्रमुखों को एकजुट करने के लिए काम किया जाए। तीसरे चरण में सभी पार्टियों को मिलाकर एक पार्टी बनाने की नीति पर काम होना चाहिए। भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए पहले भी कई मंच बन चुके हैं। ये सभी मंच लिखित संविधान पर काम करने का प्रस्ताव पारित करें. जिससे आपस में जुड़ कर काम करने में नेताओं का ईगो आड़े न आये. प्रस्ताव पारित करने वाले सभी संगठन और मंच एकजुटता दिखाने के लिए एक नया मंच या मोर्चा बनायें. इस नए मोर्चे में अपना स्थाई प्रतिनिधि चुन कर भेजें. इस मोर्चे का स्वरूप परिसंघीय हो। यह गठबंधन / मोर्चा परंपरागत तरीके से गिने-चुने लोगों द्वारा स्टीयरिंग कमेटी के विवेक पर चलने की बजाय लिखित संविधान पर चले। जिससे गठबंधन कारपोरेट संचालित मीडिया और उसके किसी कठपुतली चेहरे द्वारा संचालित और ब्लैकमेल न हो सके। गठबंधन अपने संवैधानिक प्रावधानों, नियमों, आदर्शों और संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा निकले नेतृत्व, कार्यसमिति और अपने विधायी  निकाय द्वारा संचालित हो। यह बहुत लंबा रास्ता लग सकता है, किन्तु छोटा रास्ता अपनाकर बार बार विफल होने से अच्छा है.

गठबंधन का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा / पीपल्स पार्लियामेंट का गठन

इस गठबंधन में राजनीतिक दलों के प्रमुखों के साथ-साथ दलीय  राजनीति से दूर रहकर काम करने वाले सामाजिक संगठनों के प्रमुखों को, देश के बुद्धिजीवियों, उद्योगपतियों, व्यापारियों, पत्रकारों, अधिवक्ताओं, किसान नेताओं और मजदूर नेताओं को भी जगह दिया जाए। इन सबको गठबंधन की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के अधिकार भी  दिए जाएं। गठबंधन की कार्य समिति को औपचारिक रूप से बनाने से पहले और गठबंधन के नामकरण से पहले इस गठबंधन का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन किया जाए। लिखित संविधान की जरूरत क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए गठबंधन का संविधान बनाने से पहले संविधान बनाने के उद्देश्य निर्धारित किये जाये। संविधान का एक ड्राफ्ट श्री विश्वात्मा ने और उनके विद्वान साथियों ने पहले से तैयार भी कर रखा है। हम उसमें से उपयोगी प्रावधानों का लाभ उठा सकते हैं। इस संविधान सभा में पहले चरण में सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। दूसरे चरण में कांग्रेस सहित भाजपा विरोधी यथासंभव सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रमुखों को शामिल किया जाए। संविधान सभा अपनी सामूहिक बुद्धिमत्ता द्वारा भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों में ऐसा आकर्षण पैदा करें, जिससे  सभी पार्टियां इस गठबंधन के संविधान के अनुसार अपेक्षित अपनी भूमिका निभाना पसंद करें। गठबंधन का संविधान बन जाने के बाद का नाम बदल कर पीपल्स पार्लियामेंट जैसा कुछ कर दिया जाये। पीपल्स पार्लियामेंट में उन सभी को जाये जो करोड़ो रूपये का प्रबंध नहीं कर पाने के कारण चुनाव नहीं जीत पाते, किन्तु विधायक या संसद बनाने के सर्वथा उपयुक्त है. सेलेक्शन पर आधारित यह सिलेक्टेड पीपल्स पार्लियामेंट इलेक्शन पर आधारित पार्लियामेंट को नीति निर्देशन का काम आगे भी करती रहे. इसके लिए जरूरी है कि गठबंधन के संविधान सभा / पीपल्स पार्लियामेंट के अधिकार और कर्तव्य विधिवत परिभाषित किया जायें.

विपक्षी एकता के गठबंधन से आप कैसे जुड़ सकते है?

यदि आप गठबंधन के लिखित संविधान की उपयोगिता, उक्त मान्यताओं और रणनीति से सहमत हैं तो आपसे अपील है कि संविधान सभा के औपचारिक गठन के मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करें और प्रस्तावित गठबंधन के दिन प्रतिदिन के कार्यों को सम्पादित करने में अपने हिस्से का सहयोग प्रदान करें. यह सहयोग देने के लिए आप नीचे दिए गए ऑनलाइन लिंक को खोलकर स्वैच्छिक सहयोग का ऑनलाइन फॉर्म भरके भेज दें. 

पीलकर्ता

6 एड. महमूद प्राचा, वरिष्ठ अधिवक्ता- सुप्रीम कोर्ट और दलितों और अल्पस्जन्ख्याकों के जाने माने पैरोकार

5 मंजू सुरेंद्र मोहन, वरिष्ठ समाजवादी नेत्री और महिला सशक्तिकरण ऐक्टिविस्ट

4 श्याम गंभीर, वरिष्ठ समाजवादी नेता

3 श्री कॉमरेड प्रभात रॉय, स्तंभकार

2 श्री विश्वात्मा, संस्थापक और नीति निदेशक-वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल, नई दिल्ली

1 श्री संदीप पाण्डेय, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव


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